गुरुवार, 11 मार्च 2021

जीवित रहना जंग है : प्रदीप चौहान

Kavi Pradeep Chauhan


अर्थव्यवस्था मंद है

महँगाई भई प्रचंड है

ग़रीब झेलता दंड है

जीवित रहना जंग है।


जेब सबके तंग हैं

कमाई हुई बंद है

ज़िंदगी कटी पतंग है

जीवित रहना जंग है।


कुछ घराने दबंग हैं

हर सत्ता उनके संग है

बेशुमार दौलती रंग है

जीवित रहना जंग है।


शासन सत्ता ठग है

बेइमानी बसा रग है

लूट-खसोट का जग है

जीवित रहना जंग है।


भावी पीढ़ी मलँग हैं

सुलगते नफ़रती उमंग हैं

बढ़ते धार्मिक उदंड हैं

जीवित रहना जंग है।


बेरोज़गारी भुज़ंग है

बेकारी करे अपंग है

हर जवाँ हुनर बेरंग है

जीवित रहना जंग है।


मज़दूर किसान तंग है

आन्दोलन पर बैठे संग है

कारपोरेट गोद में संघ है

जीवित रहना जंग है।


बुधवार, 10 मार्च 2021

भार : प्रदीप चौहान

 हद से ज्यादा भार लेकर दौड़ा नहीं जाता 

साथ सारा संसार लेकर दौड़ा नहीं जाता ।

दौड़ो अकेले अगर पानी है रफ़्तार

जिम्मेदारियों का पहाड़ लेकर दौड़ा नहीं जाता।



बदलाव : प्रदीप चौहान

 अकेले चल  इंसान बदल जाते हैं

ले साथ चलें  तो बदलाव लाते हैं।

उस  सफलता  के  मायने  ही  क्या

जिसे पाते ही अपने पीछे छूट जाते हैं।



मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

कवि प्रदीप चौहान

 

Kavi Pradeep Chauhan

Kavi Pradeep Chauhan

बचपन की वो यादें हसीन थीं : स्वीटी कुमारी


बचपन की वो यादें हसीन थीं 

दोस्तों के साथ वो बातें हसीन थीं।

उनकी खुशी में खुश रहते थे हम

उनकी दुःख में दुःखी रहते थे हम

तो फिर ये मोड़ कैसा था

जिसमे होना पडा जुदा हमे 

पता तो था की मिलेंगे दोस्त हर मोड़ पर

लेकिन स्कुल की तो बातें 

कुछ और थी

की वो दोस्त पुराने थे 

निराले थे

दील लगाने वाले थे 

बात चीत कर के हर मुश्किल को सुलझाने वाले थे

इस लिए तो वह दोस्त हमारे थे।

बचपन की वो यादें हसीन थीं 

दोस्तों के साथ वो बातें हसीन थीं।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

एक ख्वाब : कैलाश मंडल

एक ख्वाब देखा, 

जिसे पूरा करना है|

एक सपना है 

जिसे अधूरा नहीं छोड़ना है |

रुकावटें तो क‌ई आऐ‌ंंगी और जाएंगी

पर झुकना नहीं है|

एक सपना है 

जिसे पूरा करना है|


एक ख्वाब देखा 

जिसे पूरा करना है|

कहने वाले खुब कहेंगे, 

पर सूनना नहीं है|

चाहे जितनी भी बार गिरे ,

खड़े होकर लक्ष्य को पाना है

साथ में खड़े हैं अपने, 

जितनी भी बार गिरे हैं|

मेहनत कर 

उस ख्वाब को पूरा करना है|

एक ख्वाब देखा 

जिसे पूरा करना है |

बुधवार, 6 जनवरी 2021

चेतावनी : रोशन सिंह



*चेतावनी*

बादलों बरस लो, चाहे तुम जितना!

शीतलहर तुम बरसाओ कहर, चाहे जितना!

चाहे, कर लो तुम भी सत्ता के साथ मिलीभगत!

नहीं, डिगा पाओगे हमारे हौसले!

हम तो वो फौलाद हैं,
जो बंजर और पथरीली ज़मीन का सीना चीर देते हैं,

जो तुम्हारी बरसात और शीतलहर कभी नहीं कर पाते,

उस बंजर ज़मीन से भी अपनी मेहनत का हक़ छीन लेते हैं!

इसलिये तुम्हें चेतावनी है!

मान जाओ!

लौट जाओ!

हम तो डटे हैं अनंत काल से,

और डटे रहेंगे अनंत काल तक,

यह हमारा वादा है तुमसे!

तुमने तो हमें परखा है!

खेतों में सालों-साल,

खलिहानों में, सालों-साल,

हमने ही चुनौती दी है तुम्हें, सालों-साल,

हमने ही तुम्हें हराया है, सालों-साल,

जानते हो क्यों?

अरे! तम्हें क्या बताना?

फिर भी, हम किसान हैं!

हम धरती की सबसे जीवट जात हैं!

रोशन सिंह

Kavi Pradeep Chauhan

 





रविवार, 3 जनवरी 2021

ठंड, बारिश और अख़बार वाला: प्रदीप चौहान


ठंडी हवाएँ जब चेहरे से टकराती हैं

बिन बताए आँसू खिंच ले जाती हैं

कान पे पड़े तो कान सून्न

उँगलियों पे पड़े तो उँगलियाँ सून्न

दुखिया जूते का सुराख़ डूँढ लेती

 उँगलियों की गर्माहट सूंघ लेती

बर्फ़ सा जमातीं

साँसें थमातीं 

कंपकंपी सौग़ात दे जाती हैं।


सर्द भोर में

बारिश भी अख़ड़े 

कि जैसे बाल मुड़े और ओले पड़े

डिगाए हिम्मत और साहस से लड़ें

गिराये पत्थर की सी बूँदें

जिधर मुड़ें उधर ही ढुन्ढे

चलाये ऐसे शस्त्र

भीग़ाये सारे वस्त्र

हड्डियों को थर्राये

लहू प्रवाह को थक़ाये।


पर हम भी बड़े ढीठ हैं

पिछली कई रातों की तरह

पैरासीटामोल का संग...एक और सही

खरासते गले से जंग...एक और सही

डूबते नाँव पे जमें रहना है...

होना अख़बार वाला।

अपनी ज़िम्मेदारियां ढोते रहना है...

होना अख़बार वाला।

ठंड, बारिश में चलते रहना है...

होना अख़बार वाला।


रविवार, 4 अक्तूबर 2020

हे मेहनतकश तु कब समझेगा: प्रदीप चौहान

जाती में बाँटा
उपजाती में बाँटा
बाँटा अगड़े-पिछड़े और उपनाम
निजी स्वार्थ की पूर्ति को 
ख़त्म किये नागरीक होने की पहचान
तेरे शोषण का है जाल
तेरी समानता पर प्रहार
हे मेहनतकश इंसान 
तू कब समझेगा?


धर्म में बाँटा
मज़हब में बाँटा,
बाँटा पगड़ी, टोपी और पोशाक
धार्मिक स्वार्थों की पूर्ति को
ख़त्म किये इंसान होने की पहचान
तेरे शोषण का है जाल
तेरी इंसानियत पर प्रहार
हे मेहनतकश इंसान 
तू कब समझेगा?


वोट में बाँटा
सपोर्ट में बाँटा
बाँटा भाषा, सोच और विचार
राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति को
किये तेरे अधिकारों का व्यापार
तेरे शोषण का है जाल
तेरी समझदारी पर प्रहार
हे मेहनतकश इंसान 
तू कब समझेगा?

मैना है ये नैना है : प्रदीप चौहान

 


मैना  है  ये  नैना  है।


परियों से भी प्यारी है

माँ की नन्ही दुलारी है

ईश्वर की श्रेष्ठ रचना सी

मैना  है  ये  नैना  है।


गुमसूम सी ये रहती है

मन ही मन कुछ कहती है

अपनी ही मस्ती में खोई

मैना  है  ये  नैना  है।


सावन की ये रैना है

सुंदर सी मृगनैना है

धिर सी गम्भीर सी

मैना  है  ये  नैना  है।


बराबरी का हक़ हो इसको 

अवसर मिलें जैसे सबको 

पैरों पे खड़ी हो रही बहना है

मैना  है  ये  नैना  है।



शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

आज भुगत रहा है मीडिया : प्रदीप चौहान

 


हाथरस में रिपोर्टिंग के लिए अपने प्रवेश को तरसती, आज की मेन-स्ट्रीम मीडिया की लाचारी और इसके कारणों पर चिंतन करती ये कविता।


सत्ता की ग़ुलामी का फल

सरकारों की मेज़बानी फल

चाटूकारिता का भावी असर

आज  भुगत  रहा है मीडिया


क़लम के टूटे सम्मान का फल

पत्रकारों के लूटे स्वाभिमान फल

पत्रकारिता के ख़त्म पहचान का असर

आज  भुगत  रहा  है  मीडिया


ख़बरों से किए व्यापार का फल

जनता से किए व्यवहार का फल

टीआरपी को करते दुराचार का असर

आज  भुगत  रहा  है  मीडिया


लोकतंत्र से सीनाज़ोरी का फल

सत्ता से किए गठजोरी का फल

चौथे स्तम्भ की कमज़ोरी का असर

आज  भुगत  रहा  है  मीडिया


जनता के विश्वास की हत्या का फल

जनतंत्र के सम्मान की हत्या का फल

ख़बरों के हिंदुस्तान की हत्या का असर

आज  भुगत  रहा  है  मीडिया

शनिवार, 5 सितंबर 2020

मैं शिक्षालय हुँ : प्रदीप चौहान


बेटियों को पढ़ाया

बहनों को निर्भर बनाया

माताओं को सम्मान दिलाया

परिवारों में जागरुकता फैलाया

हज़ारों सपनों को साकार बनाया

और लाखों नए सपनों के लिए

मैं चलना चाहती हुँ

मैं चलते रहना चाहती हुँ


अनाथों को अपनाया

बेसहारों को सम्भाला

असहायों का साथ निभाया

लाखों को शिक्षित बनाया

ये कर्तव्य रहा है मेरा

ये पहचान रही है मेरी

अपनी इसी पहचान के लिए 

मैं चलना चाहती हुँ

मैं चलते रहना चाहती हुँ


मैं वही हुँ 

जहाँ तुम्हारी ढेरों यादें जुड़ी हैं

यादें तुम्हारे बचपन की

यादें तुम्हारे लड़कपन की

दोस्ती के बड़प्पन की

यादें तुम्हारे पढ़ने की

यादें तुम्हारे खेलने की

साथियों के लंच लुटने की

वैसी ही हज़ारों नयी यादों के लिए

मैं चलना चाहती हुँ

मैं चलते रहना चाहती हुँ


आप जैसे अपनों के लिए

लाखों असहाय सपनों के लिए

भटकों को राह दिखाने के लिए

मजबूरों का साथ निभाने के लिए

बेसहारों के सहारे के लिए

शिक्षा रूपी उजाले के लिए

मैं चलना चाहती हुँ

मैं चलते रहना चाहती हुँ


मुझे ज़रूरत है 

मेरे अपनों की

नए विचारों की 

नए नवाचारों की

नए पहल की

क्योंकि मेरे अपनों के लिए

लाखों नए सपनों के लिए

मैं चलना चाहती हुँ

मैं चलते रहना चाहती हुँ


मैं शिक्षालय हुँ।

मैं दीपालय हुँ।

मैं विध्यालय हुँ।

बुधवार, 12 अगस्त 2020

निराशा : प्रदीप चौहान



तेरी ये लड़ाई तो ख़ुद से है,

दब रहा अपनों के सुध से है।

थामें रिश्ते जो शमशान भए,
अब तो टूट सारे अरमान गए।

तूने झोंका सर्वस्व अपनों के वास्ते,
ख़ंजर ही मिला उम्मीदों के रास्ते।

अच्छाइयाँ तेरी कमज़ोरी बनी,
क़ुर्बानियाँ किसी को नहीं भली।

हर आशा से तुझे मिली निराशा,
हर सपने से मिला दुःख बेतहाशा।

चुप छुपकर क्यों तड़पता है,
‘प्रदीप्त’ घुटकर क्यों मरता है।

निराशा भरी ये मटकी तोड़ दे,
थक गया गर तो जीना छोड़ दे।

Kavi Pradeep Chauhan